शब्दों की दुनिया

चलो जलाए दीप वहां, जहाँ अभी अँधेरा है.

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तरुणाई का दीप जले

Posted On: 15 Nov, 2012 Others में

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धरा के कोने कोने में तम
फहराता रहता है परचम
गगन सुप्त है सुप्त दिशाएँ
सुप्त हमारी सब इच्छाएँ
जीवन के सब शब्द हैं रीते
ये रजनी जाने कब बीते
जुगनू लेकर के इकतारा
फिरता जंगल मारा मारा
एक अकेला कहाँ चले
तरुणाई का दीप जले।

बोलों पर पहरे बैठे हैं
चेहरों पर चेहरे बैठे हैं
बंधन- बंधन जीवन- जीवन
लेकर अपना अपना क्रन्दन
स्वप्न खो रहे सब नयनों के
गंतव्य छूटे चरणों के
एकत्रित कर शक्ति अपनी
बंद करो अब माला जपनी
कौन जवानी कब मचले
तरुणाई का दीप जले।
तरुणाई का दीप जले।
– प्रभु दयाल ‘हंस’



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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Madan Mohan saxena के द्वारा
November 15, 2012

बेह्तरीन अभिव्यक्ति .बहुत अद्भुत अहसास.सुन्दर प्रस्तुति. दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये आपको और आपके समस्त पारिवारिक जनो को ! मंगलमय हो आपको दीपो का त्यौहार जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार लक्ष्मी की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार..

    प्रभुजी के द्वारा
    November 16, 2012

    धन्यवाद मदन मोहन जी। आप को भी दिवाली की ढेर सारी शुभकामनाएँ.


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